उत्तराखंड रत्न- पहली प्रोफेशनल महिला जागर गायिका बंसती बिष्ट (बोलांदी नंदा )

उत्तराखंड रत्न- पहली प्रोफेशनल महिला जागर गायिका बंसती बिष्ट (बोलांदी नंदा )

नमस्कार दोस्तों, आज मैं उत्तराखंड की ऐसे रत्न के बारे में बताना चाहूंगी, जिन्हे  काफी लोग जानते भी होंगे अभी हाल ही में इन्हे ‘उत्तराखंड रत्न’ सम्मान से सम्मानित किया गया है  यह नहीं सिर्फ उत्तराखंड नहीं बल्कि पूरे देश की रत्न है इन्हे पद्मश्री और तीलू रौतेली पुरस्कार से भी नवाजा गया है इनका नाम पद्मश्री ‘बोलांदी नंदा’ बंसती बिष्ट जी है.  बसंती बिष्ट जिन्हें बोलांदी नंदा कहना उचित होगा।

उत्तराखंड के चमोली जिले के ल्वॉणी (Luwani) गांव की रहने वाली हैं। पांचवीं क्लास तक पढ़ाई करने वाली बसंती बिष्ट उस गांव की रहने वाली हैं जहां बारह साल में निकलने वाली नंदा देवी की धार्मिक यात्रा का अंतिम पढ़ाव होता है। कहते हैं कि ये एशिया की सबसे लंबी पैदल यात्रा होती है।

जिस उम्र में तमाम महिलाएं खुद को घर की दहलीज तक समेट लेती हैं, उस उम्र में उस ग्रामीण महिला ने तमाम वर्जनाएं तोड़कर रियाज शुरू किया। उत्तराखंड की पहली प्रोफेशनल महिला जागर गायिका होने का गौरव हासिल किया.

आज पुरे उत्तराखंड में जागर विधा की एकमात्र महिला जागर गायिका है।इन्हें पारम्परिक जागर और लोकगीतों से जुड़ाव इनकी माँ बिरमा देवी से विरासत में मिला और उनसे ही इन्होने इसे सीखा इन्हें परम्परागत ढोलकी, ड़ोर-थाली, ढ़ोल दमाऊं, हुड़का जैसे सभी बाध्य यंत्रो को ज्ञान तो है अपितु इन्होने अपने जागरो के माध्यम से मांगल, पंडवानी, और नंदा के जगारो को आज की पीढ़ी के लिए संजो के रखा है। हिमालयी महाकुम्भ श्री नंदा राजजात यात्रा का कोई लिखित इतिहास नहीं है जो कुछ भी हम जानते है वो यहाँ के लोकगीतों और नंदा के जागरो के द्वारा ही जान पाए है और बसंती बिष्ट ने माँ नंदा के इन जागरो को बरसो से अपने जागरो के माध्यम से संजो कर रखा है ।

हमारी युवा पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक धरोहरों और मूल्यों से दूर होते जा रहे है। उनका  मानना है की अपनी इस अमूल्य धरोहर को आने वाली पीढ़ी के लिए संजो कर रखे ।

बसंती बिष्ट ने ना सिर्फ नंदादेवी के जागर को विश्व में  पहचान दिलाई बल्कि अब तक पीढ़ी दर पीढ़ी एक दूसरे से सुनकर जो जागर उत्तराखंड समाज में चलती आ रही थी, उसको उन्होने पहली बार किताब का रूप दिया। उन्होने इस किताब को नाम दिया ‘नंदा के जागर सुफल ह्वे जाया तुमारी जातरा’

बल्कि उत्तराखंड आंदोलन के दौरान उनके लिखे गीत आज भी खूब पसंद किये जाते हैं।

जागर एक ऐसी विधा है जिसे कम से कम वाद्ययंत्रों के साथ गाया जाता है। इसमें डौंर (डमरू), थाली, हुड़का जैसे वाद्ययंत्र इस्तेमाल होते हैं। जागर गाते समय डौंर (डमरू) को बसंती बिष्ट खुद बजाती हैं। ये परंपरा आगे भी बनी रहे इसके लिये वो कई दूसरी महिलाओं को  जागर भी सीखाती हैं।

उन्होने चंडीगढ़ के प्राचीन कला केन्द्र (Ancient Art Center) से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ली ताकि वो गायन को बारीकियों को सीख सके। साल 1997 में ल्वॉणी गांव में ग्राम प्रधान के चुनाव हुए जिसमें बसंती बिष्ट  विजयी रहीं और इस तरह वो पहली महिला ग्राम प्रधान बनी। कुछ समय बाद अलग उत्तराखंड राज्य की मांग जोड़ पकड़ने लगी। बसंती बिष्ट ने इस आंदोलन में बढ़-चढ कर हिस्सा लिया। स्थानीय लोगों को जागरूक करने और आंदोलन मजबूत करने के लिए उन्होने ना सिर्फ कई गाने लिखे बल्कि उनको अपनी आवाज भी दी। इस तरह एक ओर जब उनके गाये गानों से लोगों में जोश पैदा होता, तो वहीं दूसरी ओर बसंती बिष्ट को इससे ऊर्जा और उत्साह मिलता।


तब बसंती बिष्ट ने तय किया कि क्यों ना अपनी सांस्कृतिक विरासत को बचाने के लिये कुछ किया जाये। इसके लिए उन्होने तय किया कि वो ‘मां नंदा देवी’ के जागर गाना शुरू करेंगी जिसे वो बचपन से सुनते आ रही थीं। इस जागर में ‘मां नंदा देवी’ की कहानी को गाकर सुनाया जाता है। जब बसंती बिष्ट ने जागर गाना शुरू किया तो लोगों ने इसका खूब विरोध किया लेकिन जैसे-जैसे वो प्रसिद्ध होती गई लोग उनको स्वीकार करते गये आज वो सिर्फ जागर ही नहीं गाती हैं बल्कि मांगल, पांडवानी, न्यौली और दूसरे पारंपरिक गीत भी गाती हैं।

वह स्तुति के समय गाये जाने वाले ‘पाखुला’ (Pakhula) को पहनती हैं। ‘पाखुला’ एक काला कंबल होता है जिसे पहनने में लोगों को झिझक महसूस होती थी,लेकिन वो इसे बड़े सम्मान के साथ पहनती हैं।